बर्फ पिघलने के बावजूद मोटे हो रहे हैं नॉर्वे के ध्रुवीय भालू - विज्ञान की नई पहेली

कल्पना कीजिए आर्कटिक के उस इलाके की जहाँ सूरज महीनों तक नहीं उगता। बर्फ की मोटी चादर पर एक विशाल ध्रुवीय भालू खड़ा है। उसकी सफेद खाल बर्फ से भी ज्यादा चमक रही है। लेकिन जब वैज्ञानिक इस भालू को पकड़कर उसका वजन नापते हैं, तो वे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाते।

यह भालू पहले से ज्यादा मोटा है। ज्यादा स्वस्थ है। ज्यादा ताकतवर है।

लेकिन समस्या यह है - इस भालू के पैरों के नीचे की बर्फ तेजी से पिघल रही है। पिछले तीस सालों में यहाँ की बर्फ दुनिया के किसी भी अन्य ध्रुवीय इलाके से दोगुनी तेजी से गायब हुई है। वैज्ञानिकों ने सोचा था कि ये भालू कमजोर हो जाएंगे, भूखे मरने लगेंगे। पर हो बिल्कुल उल्टा रहा है।

नॉर्वे के स्वालबार्ड द्वीपसमूह में रहने वाले ये ध्रुवीय भालू विज्ञान की किताबों को फिर से लिखने पर मजबूर कर रहे हैं। ये कहानी है उन भालुओं की जो मरने की जगह - जीना सीख रहे हैं।

जब दुनिया की सबसे तेजी से गायब होती बर्फ पर जीवन फल-फूल रहा है

सन् 1995 से 2019 के बीच बारेंट्स सागर क्षेत्र में एक चौंकाने वाली घटना हुई। यहाँ का तापमान हर दस साल में 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया - यह दुनिया के किसी भी अन्य आर्कटिक क्षेत्र से कहीं ज्यादा है।

वैज्ञानिकों ने जब आंकड़े जोड़े, तो पाया कि बर्फरहित दिनों की संख्या करीब सौ दिन बढ़ गई थी। यानी पहले जहाँ साल में केवल तीन महीने बर्फ नहीं होती थी, अब पाँच महीने से ज्यादा समय तक समुद्र खुला रहने लगा। ध्रुवीय भालुओं के लिए यह मौत का फरमान था - या कम से कम ऐसा ही माना जा रहा था।

नॉर्वेजियन पोलर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक जॉन आर्स और उनकी टीम ने 27 साल तक 770 वयस्क भालुओं को पकड़ा, उनकी नाप-तौल की। शुरुआती पाँच सालों में तो भालुओं का वजन कम हुआ - बिल्कुल वैसा ही जैसा अनुमान था। लेकिन साल 2000 के बाद एक अजीब मोड़ आया।

भालू मोटे होने लगे। उनकी चर्बी की परतें मोटी होती गईं। मादा भालू ज्यादा स्वस्थ बच्चों को जन्म देने लगीं। यह बिल्कुल वैसा था जैसे प्रकृति ने अपना नियम ही बदल दिया हो।

कनाडा के हडसन बे में रहने वाले ध्रुवीय भालू पतले हो रहे थे, कम बच्चे पैदा कर रहे थे। दक्षिणी ब्यूफोर्ट सागर में भालुओं की मृत्यु दर बढ़ रही थी। लेकिन स्वालबार्ड के भालू? वे नियम तोड़ रहे थे।

शिकारी का खेल बदल गया, नियम वही रहे

ध्रुवीय भालू मुख्य रूप से सील मछलियों का शिकार करते हैं। बर्फ पर बैठकर वे घंटों इंतजार करते हैं कि कब कोई सील सांस लेने के लिए पानी से बाहर निकले। लेकिन जब बर्फ ही नहीं रहेगी, तो शिकार कैसे होगा?


स्वालबार्ड के भालुओं ने जवाब खोज लिया।

वैज्ञानिकों ने पाया कि ये भालू अब विविध भोजन खाने लगे हैं। पश्चिमी स्वालबार्ड में भालू पक्षियों के घोंसलों पर हमला करने लगे। वे आम आइडर बत्तखों और हंसों के अंडे खाने लगे। पूर्वी इलाकों में मादा भालू उन चट्टानों पर ज्यादा समय बिताने लगीं जहाँ पक्षियों की बस्तियाँ हैं।

और यह तो बस शुरुआत थी।

स्वालबार्ड रेनडियर - जिन्हें भालू कभी नहीं छूते थे - अब शिकार बनने लगे। हाल के वर्षों में कई बार देखा गया कि भालू सफलतापूर्वक रेनडियर का शिकार कर रहे हैं। वालरस - जो दशकों के शिकार के बाद अब वापस लौट रहे हैं - उनके शव भालुओं को भोजन दे रहे हैं। हार्बर सील की बढ़ती आबादी भी भालुओं के मेन्यू में शामिल हो गई है।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई रेस्तरां बंद हो जाए, लेकिन उसके चारों ओर नए रेस्तरां खुल जाएं। मेन्यू बदल गया, लेकिन पेट भरने के विकल्प बढ़ गए।

लेकिन यह कहानी का अंत नहीं है

वैज्ञानिक जॉन आर्स की आवाज में चेतावनी साफ सुनाई देती है। वे कहते हैं - "अच्छी शारीरिक स्थिति का मतलब यह नहीं कि समुद्री बर्फ का नुकसान कोई प्रभाव नहीं डाल रहा। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि स्वालबार्ड के भालू अब तक कुछ ऊर्जावान लागतों को संतुलित करने में सक्षम रहे हैं।"


यह संतुलन कितने समय तक टिकेगा?

यदि बर्फ का नुकसान जारी रहा या तेज हुआ, तो यह क्षमता खत्म हो सकती है। वैज्ञानिकों ने केवल शरीर की स्थिति को मापा है। उन्होंने जनसंख्या का आकार, प्रजनन दर, या लंबी अवधि की जीवित रहने की दर का अध्ययन नहीं किया। शरीर अच्छा हो सकता है, लेकिन प्रजातियों का भविष्य अभी भी अनिश्चित है।

पोलर बेयर इंटरनेशनल के मुख्य अनुसंधान वैज्ञानिक जॉन व्हाइटमैन ने सही कहा - "शरीर की स्थिति पहेली का केवल एक हिस्सा है।"

हम भारतीयों के लिए यह सबक महत्वपूर्ण है। हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं, हमारी नदियों का प्रवाह बदल रहा है। स्वालबार्ड के भालू हमें बता रहे हैं कि प्रकृति जीवित रहने के लिए रास्ते खोज सकती है, लेकिन यह हमारी जिम्मेदारी नहीं हटाता। हम जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए क्या कर रहे हैं?

ये भालू बता रहे हैं - अनुकूलन संभव है, लेकिन असीमित नहीं। जब बर्फ पूरी तरह गायब हो जाएगी, तब कोई रेनडियर या अंडे उन्हें नहीं बचा पाएंगे। तब समुद्र में सील के बिना, ध्रुवीय भालू सिर्फ कहानियों में रह जाएंगे।

स्वालबार्ड की यह कहानी उम्मीद भी है और चेतावनी भी। उम्मीद - क्योंकि जीवन लचीला है। चेतावनी - क्योंकि यह लचीलापन भी अपनी सीमाएँ जानता है।

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1: बर्फ का पिघलना ध्रुवीय भालू को कैसे प्रभावित करता है?

समुद्री बर्फ का पिघलना ध्रुवीय भालुओं के लिए एक गंभीर समस्या है। ध्रुवीय भालू बर्फ पर निर्भर रहते हैं क्योंकि यहीं वे सील का शिकार करते हैं, यात्रा करते हैं और प्रजनन करते हैं। जब बर्फ जल्दी पिघलती है, तो भालुओं को खाने और प्रजनन के लिए कम समय मिलता है। बैफिन बे जैसे क्षेत्रों में, ध्रुवीय भालू अब 30 दिन अधिक समय जमीन पर बिता रहे हैं, जहां वे शिकार नहीं कर सकते। इससे वे पतले होते जा रहे हैं और उनके शावकों की संख्या में कमी आ रही है। हालांकि, नॉर्वे के स्वालबार्ड द्वीपसमूह में कुछ भालू वैकल्पिक भोजन स्रोत जैसे हिरण, पक्षियों के अंडे और वालरस के शवों से अपना गुजारा कर रहे हैं।

2: ध्रुवीय भालू को बर्फ पर आसानी से चलने में क्या मदद करता है?

ध्रुवीय भालुओं के पंजे बर्फ पर चलने के लिए विशेष रूप से तैयार होते हैं। उनके पंजों की सतह चौड़ी और खुरदरी होती है, जो फिसलन भरी बर्फ पर पकड़ बनाए रखने में मदद करती है। इसके अलावा, उनके पंजों में छोटे-छोटे उभार होते हैं जो बर्फ पर ट्रैक्शन प्रदान करते हैं। उनके पैरों के नीचे घने बाल भी होते हैं जो इन्सुलेशन और अतिरिक्त पकड़ दोनों प्रदान करते हैं। ध्रुवीय भालुओं का वजन भी उनके चौड़े पंजों पर समान रूप से वितरित होता है, जिससे वे पतली बर्फ पर भी चल सकते हैं। यह अनुकूलन उन्हें आर्कटिक के कठोर वातावरण में शिकार करने और जीवित रहने में सक्षम बनाता है।

3: क्या ध्रुवीय भालू आर्कटिक बर्फ की चादरों और हिमखंडों पर भरोसा करते हैं?

हां, ध्रुवीय भालू अपने जीवन के लगभग हर पहलू के लिए समुद्री बर्फ पर निर्भर हैं। वे मुख्य रूप से बर्फ से ढके समुद्र पर रहते हैं, जहां वे सील का शिकार करते हैं - उनका मुख्य भोजन। बर्फ उन्हें विशाल दूरियों तक यात्रा करने, संभोग करने और बच्चों को जन्म देने के लिए मांद बनाने में भी मदद करती है। जब बर्फ पिघलती है, तो ध्रुवीय भालुओं को जमीन पर जाना पड़ता है जहां भोजन सीमित होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ जल्दी पिघल रही है और देर से जम रही है, जिससे भालुओं के पास शिकार करने के लिए कम समय है। कुछ क्षेत्रों में बर्फ रहित दिनों की संख्या में 100 दिन की वृद्धि हुई है, जो इन जानवरों के अस्तित्व के लिए खतरा है।

4: एक ध्रुवीय भालू खुद को बर्फ से ढके क्षेत्र में कैसे ढाल लेता है?

ध्रुवीय भालुओं में कई अनुकूलन हैं जो उन्हें आर्कटिक की बर्फीली परिस्थितियों में जीवित रहने में मदद करते हैं। उनके शरीर पर सफेद फर की मोटी परत होती है जो गर्मी बनाए रखती है और बर्फ में छलावरण प्रदान करती है। उनकी त्वचा काली होती है जो सूर्य की गर्मी को अवशोषित करती है। ध्रुवीय भालुओं के शरीर में वसा की मोटी परत होती है जो उन्हें ठंड से बचाती है और लंबे उपवास के दौरान ऊर्जा प्रदान करती है। वे उत्कृष्ट तैराक हैं और बर्फीले पानी में लंबी दूरी तय कर सकते हैं। उनकी गंध की तीव्र क्षमता उन्हें बर्फ के नीचे सीलों को खोजने में मदद करती है। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि कुछ ध्रुवीय भालू, विशेष रूप से स्वालबार्ड में, पारिस्थितिक लचीलापन दिखा रहे हैं और बर्फ की कमी के बावजूद जमीन पर वैकल्पिक भोजन स्रोत जैसे हिरण और पक्षियों के अंडे खाकर जीवित रह रहे हैं।
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