नई दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे 'India AI Impact Summit 2026' में गलगोटिया यूनिवर्सिटी (Galgotias University) के एक एग्जीबिशन स्टॉल ने सोशल मीडिया पर भारी विवाद खड़ा कर दिया है।
स्टॉल पर 'ओरियन' (Orion) नाम से प्रदर्शित एक चार पैरों वाले रोबोट का वीडियो एक्स (X) पर तेज़ी से वायरल हुआ।
विवाद तब गहराया जब 'China Pulse' नामक एक चीनी हैंडल और कई भारतीय यूज़र्स ने दावा किया कि यह कोई इन-हाउस इनोवेशन नहीं, बल्कि चीन की रोबोटिक्स कंपनी 'यूनिट्री' (Unitree) का एक खरीदा हुआ कमर्शियल मॉडल है।
JUST IN:
— China pulse 🇨🇳 (@Eng_china5) February 17, 2026
An Indian university presents the Chinese robot Unitree Go2 as their own innovation at the AI Summit in Delhi.pic.twitter.com/facktSieyb
₹350 करोड़ के AI इकोसिस्टम बैनर के नीचे 2.5 लाख का रेडीमेड रोबोट
इस विवाद ने तब सबसे ज्यादा तूल पकड़ा जब स्टॉल के बैकड्रॉप पर लगे एक बड़े बैनर पर लोगों की नज़र गई, जिस पर गर्व से "₹350+ करोड़ का AI इकोसिस्टम" लिखा हुआ था।
सोशल मीडिया पर रोशन राय (Roshan Rai) जैसे कई वेरिफाइड यूज़र्स ने तीखा सवाल उठाया कि इतने भारी-भरकम बजट और दावों वाले प्रोजेक्ट में एक विदेशी रोबोट क्यों खड़ा किया गया है।
आम छात्रों और भारतीय टेक कम्युनिटी के लिए यह 'परसेप्शन' का एक बड़ा झटका था कि इतने बड़े सरकारी मंच पर डीप-टेक रिसर्च की जगह एक कमर्शियल गैजेट को शोकेस किया जा रहा है।
क्या हैं 1.3 लाख से 2.5 लाख तक के इस रोबोट की खूबियां?
ग्लोबल मार्केट में 'Unitree Go2' एक बेहद लोकप्रिय रोबोटिक प्लेटफॉर्म है, जिसके बेस मॉडल की कीमत $1,600 (लगभग 1.34 लाख रुपये) से शुरू होती है।
हालांकि, वायरल हो रहे टेक विश्लेषणों के अनुसार, स्टॉल पर मौजूद एडवांस मॉडल की कीमत संभवतः $2,800 (करीब 2.3 से 2.5 लाख रुपये) के आसपास है।
यह गैजेट कारखाने से ही 4D LiDAR सेंसर और 'ओपन API' सपोर्ट के साथ आता है, जिससे दुनिया भर के डेवलपर्स इसे खरीदकर इस पर अपनी कोडिंग और एल्गोरिदम टेस्ट कर सकते हैं।
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का आधिकारिक स्पष्टीकरण
सोशल मीडिया पर लगातार हो रही 'व्हाइट-लेबलिंग' की आलोचनाओं के बाद, गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक्स (X) पर अपना आधिकारिक बयान (Official Clarification) जारी कर दिया है।
— Galgotias University (@GalgotiasGU) February 17, 2026
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह रोबोटिक डॉग छात्रों की ट्रेनिंग के लिए खरीदा गया एक "लर्निंग टूल" (Learning Tool) और उनके "क्लासरूम इन मोशन" (Classroom in motion) प्रोग्राम का एक हिस्सा है।
बयान में दृढ़ता से कहा गया है कि यूनिवर्सिटी या उसके छात्रों ने कभी भी इस हार्डवेयर को 'खुद बनाने' (In-house manufacturing) का कोई दावा नहीं किया था।
अगर यह सिर्फ लर्निंग टूल है, तो स्टॉल पर इसका नाम 'Orion' क्यों रखा गया?
यूनिवर्सिटी की इस आधिकारिक सफाई ने स्थिति को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया है, लेकिन टेक कम्युनिटी के कुछ 'एथिकल' सवाल अभी भी जस के तस बने हुए हैं।
आलोचकों का तर्क है कि अगर यह सिर्फ सॉफ्टवेयर टेस्टिंग के लिए खरीदा गया एक बेस हार्डवेयर था, तो इसे एग्जीबिशन में 'Orion' का एक नया और एक्सक्लूसिव नाम क्यों दिया गया?
सबसे बड़ी बहस इस बात पर है कि क्या समिट में आने वाले दर्शकों को बैनर या ब्रोशर के ज़रिए यह स्पष्ट 'डिस्क्लेमर' दिया जा रहा था कि इस मशीन का बाहरी ढांचा कमर्शियल है और केवल अंदर का सॉफ्टवेयर कस्टमाइज्ड है।
क्या विदेशी गैजेट खरीदना गलत है?
अकादमिक रिसर्च की दुनिया में यह समझना ज़रूरी है कि एमआईटी (MIT) या स्टैनफोर्ड जैसे कई शीर्ष अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय रोबोटिक्स सॉफ्टवेयर को टेस्ट करने के लिए 'यूनिट्री' या 'बोस्टन डायनामिक्स' के बेस प्लेटफॉर्म्स खरीदते हैं।
इंजीनियरिंग के छात्र इन मशीनों पर नए विज़न-सेंसर (Vision sensor) और मशीन लर्निंग मॉडल रन करते हैं, जो अकादमिक रूप से पूरी तरह एक वैध और स्वीकार्य प्रक्रिया है।
तकनीकी रूप से यूनिवर्सिटी ने कुछ भी गलत नहीं किया है; यह पूरा विवाद मुख्य रूप से 'इवेंट ब्रांडिंग' और एक विदेशी हार्डवेयर के स्पष्ट 'ओरिजिन-डिक्लेरेशन' (Origin Declaration) के अभाव के कारण उपजा है।
टेक-समिट्स में 'डिस्क्लोज़र प्रोटोकॉल' और 'मेड इन इंडिया' की ब्रांड वैल्यू
आईटी मंत्रालय (MeitY) के सहयोग से आयोजित इतने हाई-प्रोफाइल 'Galgotias University AI Summit Controversy' ने एग्जीबिशन स्क्रीनिंग और 'डिस्क्लोज़र प्रोटोकॉल' पर एक नई और आवश्यक बहस छेड़ दी है।
आने वाले समय में सरकारी टेक-इवेंट्स में हिस्सा लेने वाले अकादमिक संस्थानों के लिए यह अनिवार्य किया जा सकता है कि वे अपने डिस्प्ले प्रोजेक्ट्स में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के 'सोर्स' को स्पष्ट रूप से घोषित करें।
दुनिया के सामने 'AI सुपरपावर' के रूप में उभरते भारत के लिए यह घटना एक सबक है कि ग्लोबल मंच पर अपनी तकनीकी पारदर्शिता (Transparency) बनाए रखना ही सबसे बड़ी 'सॉफ्ट पावर' है।

