क्या 150 साल जी पाएंगे इंसान? विज्ञान का नया दावा और बड़ी बहस
क्या मानव आयु 150 वर्ष तक पहुँच सकती है? एपिजेनेटिक घड़ियों के डेटा, हेल्थस्पैन पर ज़ोर और वैज्ञानिक बहस की पड़ताल।
मानव जीवन काल की सैद्धांतिक सीमा क्या है? यह प्रश्न अब दार्शनिक चर्चा से आगे बढ़कर परिमाणीय वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय बन गया है। हाल के वर्षों में, एपिजेनेटिक्स और जैव-सूचना विज्ञान में प्रगति ने शोधकर्ताओं को "जैविक आयु" को मापने के मानक विकसित करने में सक्षम बनाया है। इन्हीं मापदंडों के आधार पर, कुछ वैज्ञानिकों ने 120 से 150 वर्ष के बीच मानव आयु की एक सैद्धांतिक सीमा होने की परिकल्पना प्रस्तुत की है।
यह परिकल्पना मुख्य रूप से शरीर की उन्मुक्ति या लचीलेपन (resilience) में आने वाली कमी पर आधारित है। शोध से संकेत मिलता है कि उन्नत आयु में बीमारी या आघात से उबरने की शरीर की क्षमता क्रमिक रूप से कम होती जाती है। गणितीय मॉडल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि 120-150 वर्ष की आयु के आसपास, यह उन्मुक्ति इतनी न्यून हो सकती है कि जीवन को बनाए रखना असंभव हो जाए।
जैविक आयु मापन: वैज्ञानिक आधार एवं सीमाएँ
उम्र बढ़ने के अध्ययन में एक प्रमुख चुनौती इस प्रक्रिया का मात्रात्मक मूल्यांकन करना रहा है। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि एपिजेनेटिक घड़ियों (epigenetic clocks) का विकास रही है। आनुवंशिकीविद् स्टीव हॉर्वाथ द्वारा 2010 के दशक में विकसित, यह पद्धति डीएनए मिथाइलेशन नामक रासायनिक संशोधनों के पैटर्न का विश्लेषण करती है, जो जीन की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।
इन घड़ियों ने शोधकर्ताओं को यह आकलन करने में सक्षम बनाया है कि कोई व्यक्ति कैलेंडर आयु (क्रोनोलॉजिकल एज) की तुलना में कितनी तेजी से या धीमी गति से जैविक रूप से वृद्ध हो रहा है। उदाहरण के लिए, 'ग्रिमएज' नामक एक उन्नत घड़ी को मृत्यु दर जोखिम के एक शक्तिशाली भविष्यवक्ता के रूप में मान्यता मिली है।
हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये घड़ियाँ अभी भी शोध के साधन हैं। वैज्ञानिक समुदाय इनकी सटीक व्याख्या और मानकीकरण पर सक्रिय रूप से चर्चा कर रहा है। विभिन्न कंपनियों द्वारा विकसित विभिन्न घड़ियाँ विभिन्न जैविक पहलुओं को मापती हैं, जिससे उपभोक्ता स्तर पर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके अतिरिक्त, यह अभी तक पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है कि क्या ये घड़ियाँ उम्र बढ़ने के मूल कारणों को मापती हैं या केवल उसके लक्षणों को।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आशावाद, संशय और मध्यम मार्ग
इस क्षेत्र में विचारों की एक विस्तृत शृंखला मौजूद है। एक ओर, कुछ शोधकर्ता जैसे स्टीफन ऑस्टैड आशावादी हैं और मानते हैं कि 150 वर्ष की आयु तक पहुँचना संभव है। उनका तर्क है कि जैव-चिकित्सा में निरंतर नवाचार, विशेष रूप से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पर सीधे हस्तक्षेप करने वाली कायाकल्प (rejuvenation) चिकित्सकियों के विकास से, जीवन काल में नाटकीय विस्तार हो सकता है।
दूसरी ओर, संशयवादी वैज्ञानिक इस आशावाद पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। बक इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन एजिंग की प्रोफेसर जूडिथ कैम्पिसी जैसे शोधकर्ता इस बात पर बल देती हैं कि गणितीय मॉडल ऐतिहासिक आंकड़ों पर आधारित "अनुमान" मात्र हैं। उनका तर्क है कि मानव शरीर की जटिल जैविक प्रणालियों में मौलिक सीमाएँ हो सकती हैं जिन्हें केवल दवाओं या जीन थेरेपी से पार नहीं किया जा सकता। इन वैज्ञानिकों के लिए, मृत्यु एक जैविक निश्चितता बनी हुई है।
एक व्यापक मध्यम मार्ग यह सुझाव देता है कि जबकि कालानुक्रमिक आयु में भारी वृद्धि अनिश्चित बनी हुई है, "हेल्थस्पैन" – स्वस्थ जीवन के वर्षों – का विस्तार वर्तमान शोध का एक अधिक यथार्थवादी और सार्थक लक्ष्य है। इस दृष्टिकोण का लक्ष्य बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के आगमन को विलंबित करना और जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखना है, भले ही अधिकतम आयु सीमा में बहुत अधिक परिवर्तन न हो।
सामाजिक प्रभाव: हेल्थस्पैन पर केंद्रित एक नया एजेंडा
हेल्थस्पैन को प्राथमिकता देने के दृष्टिकोण के गहन सामाजिक निहितार्थ हैं। एक बढ़ी हुई अधिकतम आयु सीमा केवल तभी सामाजिक लाभकारी है यदि अतिरिक्त वर्ष स्वस्थ हों। अन्यथा, इससे स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों, पेंशन योजनाओं और अंतर-पीढ़ीगत संबंधों पर भारी दबाव पड़ सकता है।
वर्तमान शोध का एक बड़ा हिस्सा अब इसी दिशा में उन्मुख है: उम्र बढ़ने को एक समग्र जैविक प्रक्रिया के रूप में लक्षित करना, न कि केवल उससे जुड़ी व्यक्तिगत बीमारियों का उपचार करना। लक्ष्य केवल जीवन को लंबा करना नहीं, बल्कि शारीरिक व मानसिक क्षमताओं को संरक्षित करते हुए बुढ़ापे की अवधि को संकुचित करना है।
अनुत्तरित प्रश्न और भविष्य का मार्ग
इस प्रगति के बावजूद, मौलिक वैज्ञानिक प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं। क्या उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को पूर्ण रूप से रोका या उलटा जा सकता है, या क्या हम केवल उसकी गति को मध्यम रूप से धीमा कर सकते हैं? क्या 150 वर्ष की सैद्धांतिक सीमा मानव शरीर की एक अटल जैविक सीमा है, या यह भविष्य की चिकित्सीय खोजों से पार की जा सकने वाली एक बाधा मात्र है?
इन प्रश्नों के उत्तर न केवल प्रयोगशालाओं में, बल्कि नैदानिक परीक्षणों के माध्यम से, दीर्घकालिक जनसंख्या अध्ययनों से प्राप्त डेटा के विश्लेषण द्वारा, और वैज्ञानिक समुदाय द्वारा नए बायोमार्कर्स के मानकीकरण के माध्यम से मिलेंगे। अंतत:, मानव आयु की सीमा का प्रश्न एक साधारण भविष्यवाणी से कहीं अधिक जटिल है; यह जीव विज्ञान, प्रौद्योगिकी और समाज के बीच की जटिल परस्पर क्रिया को समझने का एक माध्यम है।

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