एक क्वांटम कंपासः चिड़िया दुनिया भर की यात्रा का राज़ कैसे जानती हैं?

जानिए कैसे चिड़ियां पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और क्वांटम भौतिकी का उपयोग कर हज़ारों किलोमीटर का सफर तय करती हैं,

जरा आंखें बंद करके सोचिए, आप एक छोटी-सी चिड़िया हैं, जिसका वजन एक पेंसिल के बराबर भी नहीं। आपका जन्म अलास्का की बर्फीली जमीन पर हुआ है, लेकिन अब आपको बिना रुके, बिना भूखे-प्यासे, प्रशांत महासागर को पार करके 12,000 किलोमीटर दूर न्यूजीलैंड पहुंचना है। रास्ते में न कोई नक्शा है, न कोई रास्ता दिखाने वाला। फिर भी, लाखों-करोड़ों चिड़ियां हर साल ये असंभव-सी लगने वाली यात्रा पूरी कर लेती हैं। सवाल यह है कि आखिर वो ये रास्ता ढूंढ कैसे लेती हैं? जवाब आपके और मेरे आसपास मौजूद है, लेकिन हमारी आंखों से ओझल। ये जवाब है पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का, जिसे पढ़ने के लिए चिड़ियों के पास एक 'क्वांटम कंपास' है।

बीते ज़माने के रहस्य से आज की क्वांटम पहेली तक

इस रहस्य पर इंसान सदियों से हैरान है। प्राचीन यूनान के विद्वान अरस्तू तक सोचते थे कि कुछ चिड़ियां सर्दियों में गहरी नींद में चली जाती हैं या फिर गलतियों से अपना रूप बदल लेती हैं। लेकिन आधुनिक विज्ञान ने पिछली एक सदी में इस पहेली को सुलझाना शुरू किया। हमें पता चला कि प्रवासी पक्षी सूरज और तारों का इस्तेमाल एक दिशा सूचक (कंपास) की तरह करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे पुराने जमाने के नाविक करते थे।

लेकिन असली क्रांतिकारी खोज तब हुई, जब वैज्ञानिकों ने पाया कि चिड़ियां पृथ्वी के उस अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र को भी महसूस कर सकती हैं, जो ग्रह के तरल लोहे के कोर से पैदा होता है। ये सिर्फ एक साधारण चुंबकीय सुई जैसा काम नहीं करता। पक्षी चुंबकीय क्षेत्र की रेखाओं के झुकाव के कोण (इनक्लिनेशन एंगल) को समझते हैं। मतलब, वो सिर्फ उत्तर-दक्षिण नहीं देखतीं, बल्कि ये भी जानती हैं कि चुंबकीय रेखाएं जमीन से कितने डिग्री के कोण पर झुकी हुई हैं। ये कोण ध्रुवों पर खड़ा (90 डिग्री) और भूमध्य रेखा पर लगभग समतल (0 डिग्री) होता है। यही कोण उनका असली दिशासूचक है।

चिड़िया क्या जानती है? इसका क्या मतलब है? इससे क्या फायदा?
चुंबकीय झुकाव (इनक्लिनेशन) चुंबकीय क्षेत्र रेखाएं जमीन से कितना झुकी हैं। यह ध्रुवों की ओर बढ़ने पर बदलता रहता है। "लैंडिंग का सिग्नल": एक खास कोण का मतलब है कि वो अपने प्रजनन स्थल के करीब पहुंच गई हैं और अब उतर सकती हैं।
चुंबकीय दिक्पात (डिक्लिनेशन) भौगोलिक उत्तर और चुंबकीय उत्तर के बीच का अंतर। पूर्व-पश्चिम की जानकारी: यह उन्हें अपने मानसिक नक्शे में पूर्व-पश्चिम की स्थिति का अंदाजा देता है।
चुंबकीय तीव्रता (इंटेंसिटी) चुंबकीय क्षेत्र की कुल शक्ति, जो दुनिया भर में अलग-अलग है। एक और निर्देशांक: तीव्रता में बदलाव को वो दूसरे संकेतों के साथ मिलाकर अपनी सही जगह पहचानने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं।

आंखों में छुपा है राज़: प्रकाश, प्रोटीन और क्वांटम नृत्य

सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर चिड़िया चुंबकीय क्षेत्र को महसूस कैसे करती हैं? जवाब उनकी आंखों में छिपा है। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि ये काम एक खास प्रोटीन करता है, जिसका नाम है क्रिप्टोक्रोम 4 (Cry4)।

दरअसल, जब नीली रोशनी इस प्रोटीन से टकराती है, तो उसमें एक अद्भुत रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। इस दौरान दो 'रेडिकल' बनते हैं, जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं। ये इलेक्ट्रॉन एक क्वांटम यांत्रिक गुण दिखाते हैं, जिसे 'स्पिन' कहते हैं। ये दोनों इलेक्ट्रॉन आपस में एक जटिल 'क्वांटम वाल्ट्ज' नृत्य करते हैं, जहां उनके स्पिन लाखों बार प्रति सेकंड की रफ्तार से बदलते रहते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पृथ्वी का बेहद कमजोर चुंबकीय क्षेत्र भी इस नृत्य की गति और तरीके को बदल सकता है। ठीक वैसे ही, जैसे हवा का एक हल्का-सा झोंका भी एक नाजुक मोबाइल की गति बदल देता है। यह बदलाव चिड़िया के दिमाग में एक संकेत भेजता है, जिससे उसे चुंबकीय क्षेत्र की दिशा का एहसास होता है। माना जाता है कि चिड़िया शायद इस क्वांटम प्रभाव को देख भी सकती हैं - उनकी नजर में दुनिया पर चुंबकीय क्षेत्र के रंगीन या हल्के-गहरे धब्बे दिखाई देते होंगे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पीटर होर कहते हैं कि यह एक ऐसा क्वांटम तंत्र है जो जीवों को उन उत्तेजनाओं के प्रति संवेदनशील बनाता है, जिन्हें पहले असंभव माना जाता था।

क्या पक्षियों का यह गुप्त हथियार खतरे में है?

यहां एक गंभीर चेतावनी की बात आती है। जिस तरह हम मोबाइल टावर और वाई-फाई से निकलने वाली अदृश्य रेडियो तरंगों से घिरे हैं, वो चिड़ियों की इस सूक्ष्म क्वांटम प्रणाली के लिए खतरा हो सकती हैं। प्रयोगों में देखा गया है कि कमजोर रेडियो-फ्रीक्वेंसी विकिरण भी यूरोपीय रॉबिन जैसी चिड़ियों की दिशा की समझ को पूरी तरह से बाधित कर सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ ओल्डेनबर्ग के जीवविज्ञानी हेंरिक मौरिट्सेन, जो इस क्षेत्र में अग्रणी शोधकर्ता हैं, चेतावनी देते हैं कि "इन कमजोर विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों का प्रभाव बहुत बड़ा है: वे एक स्वस्थ उच्च कशेरुकी के संवेदी तंत्र के कामकाज को बाधित कर देते हैं"।

हालांकि यह अभी तय नहीं है कि यह व्यवधान जंगल में चिड़ियों की वास्तविक प्रवास यात्रा को कितना नुकसान पहुंचा रहा है, क्योंकि वो दिशा खोजने के लिए अन्य संकेतों का भी इस्तेमाल करती हैं। लेकिन यह साफ है कि इंसानी गतिविधियां अब पृथ्वी के उस प्राकृतिक चुंबकीय नक्शे को भी धुंधला कर रही हैं, जिस पर लाखों साल से जीवन निर्भर रहा है।

इंसानों के लिए क्या सीख?

चिड़ियों की यह यात्रा सिर्फ एक प्रकृति का करिश्मा नहीं है, बल्कि विज्ञान और तकनीक के लिए एक खिड़की भी है। यह शोध हमें बताता है कि बेहद कम ऊर्जा वाले क्वांटम प्रभावों का इस्तेमाल करके कैसे अत्यंत संवेदनशील नेविगेशन सिस्टम बनाए जा सकते हैं। हो सकता है कि भविष्य में, चिड़ियों की आंखों में छुपे इस 'क्वांटम कंपास' से प्रेरणा लेकर हम ऐसी तकनीक विकसित कर पाएं जो जीपीएस से भी ज्यादा सटीक और ऊर्जा-कुशल हो।

अगली बार जब आप आकाश में V-आकार में उड़ती हंसों की कतार देखें या सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट सुनें, तो याद रखिएगा कि वो सिर्फ उड़ नहीं रही, बल्कि प्रकृति के सबसे पुराने और सबसे रहस्यमय नक्शों में से एक का इस्तेमाल कर रही हैं। एक ऐसा नक्शा, जो न दिखता है, न छुआ जाता है, लेकिन जिसे पढ़ने की कला चिड़ियों ने करोड़ों साल पहले ही सीख ली थी। सवाल यह है कि क्या हम इंसान, अपनी ही बनाई अदृश्य तकनीकी दीवारों से इस प्राचीन ज्ञान को खोने से बचा पाएंगे?

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